सौर विकिरण किसे कहते है ? तथा पृथ्वी का ऊष्मा बजट क्या है ,सूर्यातप

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पृथ्वी का ऊष्मा बजट

सौर विकिरण

पृथ्वी के पृष्ठ पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा का अधिकतम अंश लघु तरंगदैर्ध्य के रूप में आता है। पृथ्वी को प्राप्त होने वाली ऊर्जा को ‘ आगमी सौर विकिरण’ या छोटे रूप में * सूर्यातप‘ कहते हैं। पृथ्वी भू-आभ है। सूर्य की किरणें वायुमंडल के ऊपरी भाग पर तिरछी पड़ती है, जिसके सौर ऊर्जा के बहुत कम अश को ही प्रात कर पाती है पृथ्वी औसत रूप से वायुमंडल की उपरी सतह पर 1:94 कैलोरी/प्रति वर्ग सेंटीमीटर प्रतिमिनर / ऊर्जा प्राप्त करती है। वायुमडल’ की ऊपरी सतह पर प्राप्त होने वाली ऊर्जा में प्रतिवर्ष थोडा परिवर्तन होता है।

यह परिवर्तन पृथ्वी एवं सूर्य के बीच को दूरी मे अंतर के कारण होता है। सूर्य के चारों ओर परिक्रमण के दौरान पृथ्वी 4 जुलाई को सूर्य से सबसे दूर अर्थात्‌ 5 करोड, 20 लाख किलोमीटर दूर होती है। पृथ्वी की इस स्थिति को अपसौर कहा जाता है। 3 जनवरी को पृथ्वी सूर्य से सबसे निकट अर्थात्‌ 4 करोड, 70 लाख किलोमीटर दूर होती है। इस स्थिति को ‘उपसौर‘ कहा जाता है। इसलिए पृथ्वी द्वारा प्राप्त वार्षिक सूर्यातप 3 जनवरी को 4 जुलाई की अपेक्षा अधिक होता है

 

 

पृथ्वी की सतह पर सूर्यातप में भिन्नता

सुर्यातप की तीव्रता की मात्रा में प्रतिदिन, हर मौसम और प्रति वर्ष परिवर्तन होता रहता है। सूर्यातप में होने वाली विभिनता के कारक है

1 पृथ्वी का अपने अक्ष पर घुमना
2 सूर्य की किरणों का नाती कोण
3 दिन को अवधि
4 वायुमंडल की पारदर्शिता

5 स्थल विन्यास।

यह तथ्य है कि पृथ्वी का अक्ष सूर्य के चारों ओर की समतल कक्षा से 66 1/2° का कोण बनाता है, जो विभिन्‍न अक्षांशों पर प्राप्त होने वाले सूर्यातप की मात्रा को बहुत प्रभावित करता है। सूर्यातंप की मात्रा को प्रभावित करने वाला दूसरा कारक किरणों का नति कोण है। यह किसी स्थान के अक्षांश पर निर्भर करता है। अक्षांश जितना उच्च होगा (अर्थात्‌ ध्रुव को ओर) किरणों का नति कोण उतना ही कम होगा। अतएव सूर्य की किरणें तिरछी पड़ेगी। तिरछी किरणों की अपेक्षा सीधी किरणें कम स्थान पर पड़ती हैं।

 

सौर विकिरण का वायुमंडल से होकर गुज़रना

लघु तरंगदैर्ध्य वाले सौर-विकिरण के लिए वायुमंडल अधिकांशत: पारदर्शी होता है। पृथ्वी की सतह पर पहुँचने से पहले सूर्य की किरणें वायुमडल से होकर गुजरती हैं। क्षोभमंडल में मौजूद जलवाष्प, ओजोन तथा अन्य किरणें अवरक्त विकिरण अवशोषित कर लेती हैं। क्षोभमंडल में छोटे निलंबित कण दिखने वाले स्पेक्ट्रम को अंतरिक्ष एवं पृथ्वी की सतह की ओर विकोर्ण कर देते हैं। यही प्रक्रिया आकाश में रंग के लिए उत्तरदायी है। इसी से उदय एवं अस्त होने के समय सूर्य लाल दिखता है तथा आकाश का रंग नीला दिखाई पड़ता है। ऐसा वायुमंडल में प्रकाश के प्रकीर्णन द्वारा सभव होता है।

 

सूर्यातप का पृथ्वी की सतह पर स्थानिक वितरण

धरातल पर प्राप्त सूर्यातप की मात्रा में उष्ण कटिबंध में 320 वाट/प्रति वर्गमीटर से लेकर श्रुवों पर 70 वाट/प्रति वर्गमीटर तक भिन्‍नता पाई जाती है। सबसे अधिक सूर्यातप उपोष्ण कटिबंधीय मरुस्थलों पर प्राप्त होता है, क्योंकि यहाँ मेघाच्छादन बहुत कम पाया जाता है। उष्ण कटिबंध की अपेक्षा विषुवत्‌ वृत्त पर कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है। सामान्यतः: एक ही अक्षांश पर स्थित महाद्वीपीय भाग पर अधिक और
महासागरीय भाग में अपेक्षतया कम मात्रा में सूर्यातप प्राप्त होता है। शीत ऋतु में मध्य एवं उच्च अक्षांशों पर ग्रीष्म ऋतु की अपेक्षा कम मात्रा में विकिरण प्राप्त होता है।

 

 

वायुमंडल का तापन एवं शीतलन

वायुमंडल के गर्म और ठंडा होने के अनेक तरीके हैं। प्रवेशी सौर विकिरण से गर्म होने के बाद पृथ्वी सतह के निकट स्थित वायुमंडलीय परतों में दीर्घ तरंगों के रूप में ताप का संचरण करती है, पृथ्वी के संपर्क में आने वाली वायु धीरे-धीरे गर्म होती है। निचली परतों के संपर्क में आने वाली वायुमंडल की ऊपरी परतें भी गर्म हो जाती हैं।

इस प्रक्रिया को चालन कहा जाता है। चालन तभी होता है जब असमान ताप वाले दो पिंड एक-दूसरे के संपर्क में आते हैं। गर्म पिंड से ठंडे पिंड की ओर ऊर्जा का प्रवाह चलता है। ऊर्जा का स्थानांतरण तक तब होता रहता है जब तक दोनों पिंडों का तापमान एक समान नहीं हो जाता अथवा उनमें संपर्क टूट नहीं  पृथ्वी द्वारा प्राप्त प्रवेशी सौर विकिरण, जो लघु तरंगों के रूप में होता है, पृथ्वी की सतह को गर्म करता है। पृथ्वी स्वयं गर्म होने के बाद एक विकिरण पिड॒ बन जाती है और वायुमंडल में दीर्घ तरंगों के रूप में ऊर्जा का विकिरण करने लगती है। यह ऊर्जा वायुमंडल को नीचे से गर्म करती है। इस प्रक्रिया को ‘ पार्थिव विकिरण कहा जाता है।

 

 

पृथ्वी का ऊष्मा बजट

 

पृथ्वी ऊष्मा का न तो संचय करती है न ही ह्रास करती है यह अपने तापमान को स्थिर रखती है। ऐसा तभी सम्भव है, जब सूर्य विकिरण द्वारा सूर्यातप के रूप में प्राप्त ऊष्मा एवं पार्थिव विकिरण द्वारा अंतरिक्ष में संचरित ताप बराबर हो मान लें कि वायुमंडल को ऊपरी सतह पर प्राप्त
सूर्यातप 100 प्रतिशत है। वायुमंडल से गुजरते हुए ऊर्जा का कुछ अंश परावर्तित, प्रकीर्णित एवं अवशोषित हो जाता है। केवल शेष भाग ही पृथ्वी की सतह तक पहुँचता है। 100 इकाई में से 35 इकाइयाँ पृथ्वी के धरातल पर पहुँचने से पहले ही अंतरिक्ष में परावर्तित हो जाती है। 27 इकाइयाँ बादलों के ऊपरी छोर से तथा 2 इकाइयाँ पृथ्वी के हिमाच्छादित क्षेत्रों द्वारा परावर्तित होकर

 

Define heat budget.

 

लौट जाती हैं। सौर विकिरण रे की इस परावर्तित मात्रा को पृथ्वी का एल्बिडो कहते है पृथ्वी का एल्बिडो कहते हैं। प्रथम 35 इकाइयों को छोड़कर बाको 65 इकाइयाँ अवशोषित होती है 4 वायुमंडल में तथा 5 पृथ्वी के धरातल द्वारा। पृथ्वी द्वारा अवशोषित ये 5 इकाइयाँ पुन; पार्थिव विकिरण के रूप में लौटा दी जाती हैं। इनमें से 7 इकाइयों तो सीधे अंतरिक्ष में चली जाती हैं और 34 इकाइयाँ वायुमंडल द्वारा अवशोषित होती है  6 इकाइयाँ स्वयं वायुमंडल द्वारा, 9 इकाइयाँ संवहन के जरिए और 9 इकाइयाँ संघनन की गुप्त ऊष्मा के रूप में। वायुमंडल द्वारा 48 इकाइयों का अवशोषण होता है इनमें 4 इकाइयाँ सूर्यातप की और 34 इकाइयाँ पार्थिव विकिरण की होती हैं। वायुमंडल विकिरण द्वारा इनको भी अंतरिक्ष में वापस लौटा देता है। अतः पृथ्वी के धरातल तथा वायुमंडल से अंतरिक्ष में वापस लौटने वाली विकिरण की इकाइयाँ क्रमशः 7 और 48 हैं, जिनका योग 65 होता है

वापस लौटने वाली ये इकाइयाँ उन 65 इकाइयों का संतुलन कर देती हैं जो सूर्य से प्राप्त होती हैं। यही पृथ्वी का ऊष्मा बजट अथवा ऊष्मा संतुलन है। यही कारण है कि ऊष्मा के इतनी बड़े स्थानांतरण के बावजूद भी पृथ्वी न तो बहुत गर्म होती है और न ही ठंडी. होती है।

 

 

Global Heat Budget - GEO CAR. /SOCIAL STUDIES

 

पृथ्वी की सतह पर कुल ऊष्सा बजट में भिन्‍नता 

जैसा कि पहले व्याख्या की जा चुकी है, पृथ्वी को सतह पर प्राप्त विकिरण की मात्रा में भिन्‍नता पाई जाती है। पृथ्वी के कुछ भागों में विकिरण संतुलन में अधिशेष  पाया जाता है, परंतु कुछ भागों में ऋणात्मक संतुलन होता है। पृथ्वी वायुमंडल-तंत्र के शुद्ध विकिरण में अक्षांशीय भिन्‍नता को दर्शाया गया है। यह चित्र दर्शाता है कि शुद्ध विकिरण में अधिशेष 40% उत्तरी एवं दक्षिणी अक्षांशों में अधिक है, परंतु ध्रुवो के पास कमी पाई जाती है। उष्ण कटिबंधीय क्षेत्रों से ताप ऊर्जा ध्रुवों की ओर पुनर्वितरण होता है फलस्वरूप उष्णकटिबंध ताप संचयन के कारण बहुत अधिक गर्म नहीं हो और न ही उच्च अक्षांश अत्यधिक के कमी के कारण पूरी तरह जमे हुए हैं।

 

 

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